आदिशक्ति के प्लेटफॉर्म को मूर्ति का इंतजार

करीब एक साल से आसमान निहार रहे सरिए, दो नवरात्रि गुजर गईं... श्रद्धालु पूछ रहे— आखिर कब होगी मूर्ति स्थापित ??

सलकनपुर। फोटो स्टोरी एसके चौहान

करोड़ों रुपए की लागत से विकसित किए जा रहे देवीलोक का सपना कागजों में लगभग पूरा दिखाई देता है, लेकिन धरातल पर इसकी सबसे महत्वपूर्ण पहचान आज भी अधूरी खड़ी है। जिस स्थान पर 30 फीट ऊंची आदिशक्ति (अर्धनारीश्वर) की भव्य प्रतिमा स्थापित होकर श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बननी थी, वहां पिछले लगभग एक वर्ष से केवल खाली प्लेटफॉर्म और आसमान की ओर उठे लोहे के सरिए ही नजर आते हैं। यह दृश्य विकास के दावों से कहीं अधिक सरकारी सुस्ती और कार्य एजेंसियों की जवाबदेही पर सवाल खड़े करता है।

सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि इस दौरान दो-दो नवरात्रि पर्व बीत गए। लाखों श्रद्धालुओं ने मां विजयासन के दर्शन किए, लेकिन जिस भव्य प्रतिमा को देवीलोक की पहचान बनाया जाना था, उसका इंतजार आज भी खत्म नहीं हुआ। हर दिन हजारों श्रद्धालु इस खाली प्लेटफॉर्म को देखते हैं और एक ही सवाल पूछते हैं— "क्या करोड़ों की परियोजना में सबसे जरूरी काम को ही भुला दिया गया?"

प्लेटफॉर्म पर खड़े जंग खाते सरिए मानो हर गुजरते दिन के साथ सरकारी दावों का मौन मजाक उड़ा रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि समय तो आगे बढ़ गया, लेकिन जिम्मेदार विभाग और निर्माण एजेंसी की घड़ी यहीं आकर थम गई है। करोड़ों रुपए खर्च होने के बाद भी आस्था के इस केंद्र का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा अधूरा पड़ा है।

विदिशा निवासी श्रद्धालु संतोष तिवारी बताते हैं कि पिछले वर्ष शारदीय नवरात्रि में भी उन्होंने यही दृश्य देखा था। इस बार फिर दर्शन करने पहुंचे तो तस्वीर जस की तस मिली। उनका कहना है कि यदि इतने लंबे समय बाद भी प्रतिमा स्थापित नहीं हो सकी, तो आखिर परियोजना की समय-सीमा और गुणवत्ता की निगरानी कौन कर रहा है? करोड़ों रुपए की योजना में ऐसी सुस्ती श्रद्धालुओं की भावनाओं के साथ न्याय नहीं करती।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि अधिकारियों की उदासीनता और ठेकेदार की लापरवाही ने इस महत्वाकांक्षी परियोजना की गति रोक दी है। यदि समय पर मॉनिटरिंग होती और कार्य की नियमित समीक्षा होती, तो शायद आज यह प्लेटफॉर्म अपनी भव्य प्रतिमा के साथ श्रद्धालुओं का स्वागत कर रहा होता। लेकिन हकीकत यह है कि यहां अधूरापन ही सबसे पहले नजर आता है।

सबसे गंभीर सवाल यह भी है कि जब करोड़ों रुपए की सार्वजनिक राशि से निर्माण कार्य कराया जा रहा है, तब समय-सीमा का पालन नहीं होने पर अब तक किसी की जवाबदेही क्यों तय नहीं हुई? क्या देरी के लिए निर्माण एजेंसी पर कोई कार्रवाई हुई? क्या संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा गया? या फिर यह परियोजना भी सरकारी फाइलों में केवल "प्रगति पर" लिखकर आगे बढ़ा दी जाएगी?

आज यह खाली प्लेटफॉर्म केवल अधूरा निर्माण नहीं, बल्कि व्यवस्था की सुस्ती का प्रतीक बन चुका है। श्रद्धालुओं की आस्था इंतजार में है, लेकिन जिम्मेदार तंत्र की चुप्पी टूटने का नाम नहीं ले रही। सवाल अब भी वहीं खड़ा है— आखिर 30 फीट ऊंची आदिशक्ति सहित सप्तमात्रिका एवं गौरी गणेश की प्रतिमा  का इंतजार कब खत्म होगा? और करोड़ों रुपए की परियोजना का यह सबसे महत्वपूर्ण केंद्र कब अपनी पूर्ण गरिमा के साथ श्रद्धालुओं के सामने होगा?

फिलहाल, आसमान की ओर उठे सरिए हर गुजरते दिन यही गवाही दे रहे हैं कि यहां प्रतिमा से ज्यादा लंबा इंतजार सरकारी जवाबदेही का हो गया है।

संबंधित अधिकारी का कहना है कि उक्त कार्य जुलाई में पूर्ण कर दिया जाएगा परंतु ठेकेदार की उदासीनता समय अवधि को बस आगे बढ़ाई जा रही है अब देखना यह है कि आखिर कब इस प्लेटफार्म पर आदि शक्ति की मूर्ति स्थापित हो सकेगी।